शास्त्री रूपेश अजित सौजना
; इम्फाल मणिपुर मो. 9468626114
विषय बहुत ही मार्मिक है क्योंकि बात जिन धर्म,जैन संस्कृति और वर्तमान तीनों की है और मैं अपनी बात मध्य से प्रारम्भ करता हूं क्योंकि मध्य में ही प्रथम विषय सन्निहित हो जायेगा जिन संस्कृति जैन संस्कृति अनादिकालीन अनादिनिधन है लेकिन वर्तमान की शिक्षा की पद्धति बदलने के कारण वर्तमान की युवा पीढी है जो कि विशेष शिक्षाओं से सम्पन्न है देश देशांतरों की संस्कृतियों को देखने वाली है वह आज इसे समझ नहीं पा रही है या दिग्भ्रमित हो रही है मैं खासकर उन्हीं युवाओं को लक्ष्य में ले कर लिख रहा हूं।
जैन संस्कृति मूल रूप से वैज्ञानिक तथ्यों के आधार पर खरी उतरने वाली है लेकिन अफसोस है कि इसके प्रचार प्र्र्रसार में बहुत ही कमी कर दी है बल्कि होना ये चाहिए था कि समय के साथ साथ इसमें और तीव्रता होनी चाहिए थी यदि किसी भी प्रकार से इसका प्रचार प्रसार यदि हो रहा है तो वह बहुत ही नगण्य स्थिति में है जो प्रचार प्रसार भगवान महावीर स्वामी के 2600वें जन्मकल्याणक के अवसर पर हुआ था ऐसा कुछ निरन्तर करते रहने की आवश्यकता है क्योंकि वर्तमान पीढी वैज्ञानिक तर्कों को जानती है और वह वैज्ञानिक तथ्य अधिकांश विद्वानों,मुनियों,श्रावकों के पास ना होने के कारण भावावेश में आ कर वे या तो प्रश्नकर्ता को कुतार्किक सिद्ध करने में लग जाते हैं या फिर सीधा नास्तिक ही सिद्ध कर देते हैं यह मुख्य वजह है जिससे नव युवा पीढी जैन जीवन शैली से मुंह फेर रही है इसलिए वह पूर्वाचायों के कथनों को भी वह एक रूढी मात्र ही मानती है इसलिए हम सभी का प्रथम दायित्व है कि हम किस प्रकार से पूर्व में दी हुर्ह सामग्री को खोल कर वैज्ञानिक तथ्यों के आधार पर युवाओं को सौंप पाते हैं क्योंकि सर्वे किया जाये तो भारत मैं जैन संस्क्ति को स्वीकार करने वालों की संख्या अल्पअतिअल्प ही है लेकिन विदेशों में इनकी संख्या लगातार बढ रही है आज जिन्हें हम वीगन की परिभाषा में शाकाहारी समझते हैं वह मुख्यरूप से जैन संस्क्ति का ही विशेष प्रभाव हैं। मेरा समझता हूं कि भारतवर्ष में या अन्य जगह देश देशान्तरों में स्थानिय स्तर पर जो विद्वतगण निवास कर रहे हैं और जो सामाजिक,राजकिय,राष्ट्रिय,अर्न्तराष्ट्रिय स्तर पर जो विद्वान कार्यरत् हैं वह इस कार्य को बखूबी कर सकते हैं क्योंकि बात करें जिनधर्म की तो इसे हमें धर्म नाम के संकुचित दायरे से बाहर निकाल कर जीवनकला के व्यापक दायरे में लाना चाहिये चाहे वह टेलीविजन मीडिया हो या प्रिंट मीडिया या सोशल मीडिया हो इन सब के माघ्यम से व्यापक स्तर पर प्रचारित प्रसारित करना चाहिए जैसा कि वर्तमान में धर्म के नाम पर जो कुछ चल रहा है धर्म और मंदिरों के नाम पर इस प्रकार का व्यापारिक मुद्दा न बनने दें इस सब को देख कर आज के बच्चे और ज्यादा घबडाते हैं आज हम टीवी चैनलों पर देखते हैं कि जगह जगह मंदिर निर्माण की होड लगी है सब जगह से शांतिधारायें प्रसारित करवा कर प्रत्येक कार्यों की राशियां फिक्स करके दान मंगाया जा रहा है इस कार्य में मेरा मत है कि जिनालय भी आवाश्यक हैं और जिनधर्म के पालनकर्ता भी आवाश्यक हैं लेकिन वर्तमान में हम सब देख रहे हैं कि जैनियों में भी जिनधर्म पालन करने की बात तो दूर रही मंदिर जी जाने वाले लोगों की भी संख्या अल्प ही रह गई है।
लेकिन चर्च,मस्जिद या अन्य मतावलम्वियों के मंदिर जाने वालों की संख्या जैन समाज में प्रतिदिन बढ रही है वहां जाने से उन्हें कोई गुरेज नहीं है इसलिए अब हमारी प्राथमिकता जिनालयों को छोड कर हमारी शिक्षा पद्धति पर होना चाहिए शिक्षा ऐसी हो जो
प्।ै च्ब्ै प्च्ै डठठै ठभ्डै ठ।डै डठ। क्स्प्ज् ब्व्डच्न्ज्म्त् डच्भ्प्स् च्भ्क् ब्। प्प्ज् म्छळप्छम्म्त्ष्ै ।क्टव्ब्।ज्म्ष्ै श्रन्क्ळम्ै ैब्प्म्छज्प्ैज्ै ठण्ब्व्ड डण्ब्व्ड आदि जैसी उच्च गुणवत्ता पूर्ण शिक्षा दे सके जो संस्थान सफल व्यवसायी उधोगपति निकाल सकें। इसके लिए अब हमें बडे स्तर पर जैन हाईस्कूलस्, इंटरमीडियेट स्कूलस इंस्टीटयूट्स युनिवर्सिटीज आदि तैयार करने की आवश्यकता है क्योंकि आज जो संस्थान चल रहे हैं वह अभी तक फ्री आफ कॉस्ट होने के कारण वर्तमान में आवाश्यक उच्च गुणवत्तापूर्ण उच्च दर्जे की शिक्षा प्रदान नहीं कर पा रहे हैं इसलिए हम सब समाज को इस बारे में जाग्रत करें उन्हें बतायें कि जैन संस्कारों,श्रावक संस्कारों के साथ उच्च शिक्षा का प्रयास और प्रबंध करना चाहिए आज के समय में 8वीं से 12वीं तक के बच्चों के लिए ही अच्छी शिक्षा दिलाने के लिए 1 लाख से 5-7 लाख रुपये तक खर्च करने पडते हैं और इसी के साथ जहां बच्चों को हॉस्टलों में रखा जा रहा है वह लगभग 70 प्रतिशत तक कैथोलिक पद्धति से संचालित किये जा रहे हैं जहां मांस आदि अभक्ष्य वस्तुओं के खान पान की तरफ बच्चों को आकर्षित करके उन्हें भारतिय परम्पराओं से च्युत किया जा रहा है और यह भी परम सत्य है कि भारत में निवासरत सबसे छोटी कम्युनिटी होने के बावजूद भी क्रिश्चियन कम्यूनिटी का भारत की 60 से 65 प्रतिशत शिक्षा व्यवस्था पर कब्जा है जो विस्तारवादी नीति होने के कारण बहुत ही चिंतनिय विषय है। जैन दम्पत्यिं को भी जैन समाज के कोई उच्च शिक्षा संस्थान न होने के कारण विवस होकर ऐसे संस्थानों में बच्चों को न चाहते हुए भी भेजना पड रहा है।
जिस प्रकार से हमने विगत दो दशकों का समय हमारे मंदिरों के साज सज्जा और मंदिरों की प्राचीरों को खडा करने में लगाया है तो मैं कहता हूं कि यदि मात्र एक दशक का समय ही हम हमारी शिक्षा व्यवस्था पर जोर दे दें तो वर्तमान में दिख रही अव्यवस्थाओं का काया पलट हो जायेगा जब शिक्षा पद्धति बदलती है तो मानसिकता बदलती ही है यही कारण है कि वर्तमान में युवा पीढी की मासिकता पश्चिमी सभ्यता के समान स्वछंद होती जा रही है अब हमें चाहिए कि इस व्यवस्था को संकल्पबद्ध होकर बदलना ही होगा पहले हम वर्तमान में उपयोगी सिद्ध हो रही शिक्षा के साथ जैन जीवन शैली का समन्वय करके ऐसे संस्थान खोलें। कोटा,हैदराबाद की समाजों ने तत्परता के साथ कुछ अंश तक कार्य करने का प्रयास किया है लेकिन हमें इनके अलावा भी सभी मेट्रो सिटियों,महानगरों एवं सभी राज्यों की राजधानियों में इस प्रकार के संस्थान खोलना आवश्यक हो गया है इन संस्थानों से मेरा मंतव्य शिक्षा के साथ निवास स्थान भी है जहां शुद्ध भोजन के साथ के साथ सुबह शाम की एक फ्रेंकली रिलिजिन क्लास या आर्ट ऑफ लिविंग क्लास का समाव्रश होना चाहिए जहां तक मेरा विचार है कि यह कार्य सर्व साधारण रूप से सभी जगह की समाजों के मंदिरों में भी कर सकते हैं भले ही यदि कोई श्रावक व्यवसाई प्राईवेट स्तर पर भी यह कार्य कर रहे हैं या करना चाहते हैं तो उन्हें भी बढावा दें। इसके साथ एक और कार्य है कि जो बच्चे स्वतंत्र रूप से बडे शहरों में अकेले अध्यन अध्यापन का कार्य या अकेले नोकरियां कर रहे हैं उन्हें शुद्ध भोजन की व्यवस्था उपलब्ध करायें।
शिक्षा के पश्चात बात आती है विवाह संस्कारों की यह वर्तमान में बहुत बडा मुद्दा बन चुका है जिस प्रकार से जैन समाज में बेटियों की कमी बताई जा रही है वास्तविक रूप से यदि इसे जमीनी स्तर पर देखा जाये तो ऐसा बिल्कुल भी नहीं है मातापिता के अरमानों ने अच्छे लडकों और बेटियों की कमी बना रखी है बल्कि होना ये चाहिए कि नियति को स्वीकार करके सामाजिक व्यवस्थाओं में सभी को अपना अपना योगदान देना चाहिए। पोस्टग्रेजुएसन तक की शिक्षा का ध्यान रखते हुए भी विवाह के लिए लडके की अधिकतम उम्र 25 से 28 वर्ष एवं लडकियों की अधिकतम उम्र 22 से 25 वर्ष रखना चाहिए लडके लडकियों की अधिक उम्र तक विवाह नहीं होने के कारण विजातिय विवाहों के केश या लडकियों के अन्य समाज के लडकों के साथ भाग कर विवाह रचाने क केश सभी के लिये खूब सुनने और देखने मिल रहे हैं इसी के साथ जो लडके लडकियां 35 वर्ष की उम्र में मातापिता बनेंगे वह दम्पत्यिं संतान का वह सुख कभी भी नहीं भोग सकते जिसे आप या आपके पूर्व की पीढियां भोग चुकीं हैं और एक खास उम्र के बाद एक दूसरे में ढलने की या समझने भी गुंजाईसें बिल्कुल कम हो जातीं हैं इसके लिए जैन समाज के सभी विद्वतगण और सभी गणमान्य महानुभाव एवं सभी सामाजिक संस्थायें अपना ध्यान आकर्षित करके अखिल भारतिय जैन समाज के स्तर पर जन सम्पर्क आन्दोलन चला कर समाज को जागरूक करें जगह जगह जैन विवाह सम्मेलन,युवा प्रतिभा सम्मान,जैन युवा परिचय सम्मेलन करावें ।
इसके पश्चात बात आती है समाज की वर्तमान में टूटता हुआ समाज बहुत बडी चिंता का विषय है जिसका प्रमुख और पहला कारण है संतवाद और पंथवाद दूसरा कारण समाज में सन्निहित होती एकल परिवारों की पद्धति तीसरा कारण स्वयं के मान की पुष्टि करने के लिए एक दूसरे को धार्मिक सामाजिक और व्यापारिक स्तर पर एक दूसरे को नीचा दिखाने की प्रवृत्ति इसलिए अब हमें बहुत जरूरी है कि समाज का एकता के बन्धन में बांधे ऐसे लोगों को समाज के उच्चपदों पर आसीन करें जो समाज के प्रत्येक वर्ग को समझ सकें सबकी भावनाओं को समझ कर समाज को आगे बढाने का कार्य कर सकें जिनके पास निर्णय लेने की शक्ति हो जो स्वयं से पहले समाज के लिए सोचें और जो सन्तवाद,पंथवाद और ग्रंथवाद से उपर उठकर एकतावाद,मित्रवाद और सहयोगवाद को बढावा दे सकें जो किसी भी प्रकार की वैमनस्यता के एक दूसरे के सुख दुःख में शामिल हो सकें जो समाज के प्रत्येक वर्ग को विश्वास और अहसास दिला सकें कि समाज का हर एक सदस्य एक दूसरे के साथ है जो समाज की प्रगति का सपना देखते हों ऐसे लागों को आगे लाऐं।
और सम्पूर्ण लेखन का सार यह है कि हम सभी लोग शिक्षा के माध्यम से जिन धर्म और जैन संस्कृति को वर्तमान ही नहीं बल्कि लम्बे भविष्य के लिए भी संरक्षित कर सकते हैं।
प्रस्तुत सामग्री अनुभव के आधार पर लिखी गई है पाठकगण अपनी रुचि अनुसार ग्रहण करें।
!!धन्यवाद!!
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nice article
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