जैन धर्म में रक्षाबंधन का महत्व


भारत संस्कृति में अनेक सम्प्रदाय अपनी अपनी मान्यताओं के अनुसार अनेक पर्वों को मनाते हैं उन पर्वों में रक्षाबंधन भी एक महत्वपूर्ण पर्व है ।
रक्षाबंधन पर्व जैन धर्म में भी एक बहुत ही महत्वपूर्ण नैमित्तिक पर्व है जिसकी कथा हरिवंश पुराण में एवं और अनेक महत्वपूर्ण प्राचीन ग्रन्थों में वर्णित है।आइए जानते हैं।
जैन धर्म में रक्षा बंधन पर्व क्यों मनाते हैं।
इस कथा के अनुसार हस्तिनापुर के राजा महापद्म ने अपने बड़े पुत्र पद्मराज को राजभार सौंप वैराग्य धारण किया। उनके साथ उनका छोटा पुत्र विष्णुकुमार भी अपने पिता के साथ अविनाशी मोक्ष की प्राप्ति के मार्ग पर चल दिए। उधर उज्जयिनी नगरी के राजा श्रीवर्मा के मंत्री बलि नमुचि, बृहस्पति और प्रहलाद थे। चारों जैन धर्म के कट्टर विपक्षी थे। 
एक बार यहां अकंपनाचार्य मुनि अपने ७०० शिष्यों के साथ पधारे। नगर के बाहर उद्यान में वे ठहरे। आचार्य को जब ज्ञात हुआ कि राजा के चारों मंत्री अभिमानी है और जैन धर्म के विरोधी हैं। आचार्य ने शिष्यों को बुलाकर आज्ञा दी कि जब राजा और मंत्री यहां आएं तो मौन धारण करके ध्यानमग्न बैठे। इसके द्वेषवश विसंवाद नहीं होगा और विवाद उत्पन्न नहीं हो सकेगा। 
गुरु की आज्ञा के पालन की हामी सभी ने भर दी। इस समय श्रुतसागर नामक मुनि मौजूद नहीं थे। इस कारण उन्हें इसका पता नहीं चला। जब राजा मंत्रियोंसहित वन में मुनि के दर्शनों को पधारे तो मुनि संघ मौन था। इसे देख एक मंत्री ने कहा देखिए राजा ये मुनि नहीं बोल रहे हैं क्योंकि इनमें किसी प्रकार की विद्या नहीं है। इसके बाद मंत्रियों ने मुनियों की घोर निंदा की। 
इस समय श्रुतसागर मुनि नगर से लौट रहे थे। उन्होंने जब यह बात सुनी तो मंत्रियों से शास्त्रार्थ करने को कहा। शास्त्रार्थ में मंत्री बुरी तरह पराजित हुए और मुनि के तर्कों के आगे राजा नतमस्तक हो गए। मंत्री इसे अपमान समझ उस समय तो वहां से चले गए। इधर श्रुतसागर मुनि ने आकर गुरु को सारा वृत्तांत सुनाया तब आचार्य ने उन्हें जंगल में उसी स्थान पर जाकर तप करने को कहा जहां उन्होंने शास्त्रार्थ किया था ताकि संघ के अन्य लोगों पर उपसर्ग नहीं आए।
यह तो निश्चित था कि मंत्री अपमान से कुपित हो उपसर्ग करेंगे। ऐसा ही हुआ। ध्यानमग्न मुनि श्रुतसागर पर मंत्रियों ने मौका पाकर हमला किया। उन्होंने जैसे ही तलवार उठाई वनदेव ने आकर उन्हें जड़ कर दिया। जब इस बात की खबर राजा को लगी तो उन्होंने मंत्रियों को देश निकाला दे दिया। अब चारों मंत्री वहां से निकल हस्तिनापुर पहुंचे। उन्होंने वहां के राजा पद्मराय से नौकरी मांगी। राजा ने उन्हें योग्य पदों पर आसीन किया। बलि नामक मंत्री ने पद्मराय का विश्वास हासिल करने के लिए कूटनीति और छल से एक विद्रोही राजा को उसके अधीन करा दिया। अब क्या था पद्मराय ने खुश हो उससे वर मांगने को कहा। 
उसने कहा- राजन्‌ वक्त आने पर मांग लूंगा। कुछ समय पश्चात अकंपनाचार्य मुनि ससंघ हस्तिनापुर पधारे। राजा पद्मराय अनन्य जैन भक्त थे। बलि को जब इसकी जानकारी मिली तो उसके अंदर बदले की भावना बलवती हो गई। उसने राजा से अपना वर मांगा और कहा कि राजन्‌ मुझे सात दिन के लिए राजा बना दीजिए। राजा ने उसे वर दे दिया और राजपाट देकर निश्चिंत हो महल में चले गए। इधर बलि ने अपनी चालें चलना शुरू की। उसने आचार्यसहित ७०० मुनियों के संघ पर उपसर्ग करना प्रारभ किया, जिस स्थल पर मुनि संघ ठहरा था वहां चारों ओर कांटेदार बागड़ बंधवा कर उसे नरमेध यज्ञ का नाम दे वहां जानवरों के रोम, हड्डी, मांस, चमड़ा आदि होम में डालकर यज्ञ किया। इससे मुनियों को फैली दुर्गंध और दूषित वायु से परेशानी होने लगी। उन्होंने अन्न-जल त्याग कर समाधि ग्रहण की। मुनियों के गले रुंधने लगे, आंखों में पानी आने लगा और उनके लिए सांस लेना भी मुश्किल हो गया। 
उनकी इस विपत्ति को देख नगरवासियों ने भी अन्न-जल त्याग दिया। उधर मिथिलापुर नगर के वन में विराजित सागरचंद्र नामक आचार्य ने अवधि ज्ञान से मुनियों पर हो रहे इस उपसर्ग को जान अपने शिष्य पुष्पदंत को कहा तुम आकाशगामी हो जाओ और धरणीभूषण पर्वत पर विष्णुकुमार मुनि से इस उपसर्ग को दूर करने का विनय करो वे विक्रिया ऋद्धि प्राप्त कर चुके हैं। क्षुल्लक पुष्पदंत गुरु की आज्ञा पाकर पर्वत पर पहुंचे और मुनियों की रक्षा का अनुरोध किया। विष्णुकुमार मुनि अविलंब हस्तिनापुर आए। 
उन्होंने पद्मराय को धिक्कारा कि तुम्हारे राज्य में ऐसा अनर्थ क्यों हो रहा है तब राजा ने उन्हें पूरा वृत्तांत सुनाया जिसे जान मुनि ५२ अंगुल का शरीर बना ब्राह्मण का वेश धारण कर बलि के पास गए। बलि ने उनका आदर-सत्कार किया और उनसे सेवा का मौका देने को कहा। इस पर ब्राह्मण वेशधारी मुनि ने उनसे तीन डग जमीन मांगी। मुनि ने अपनी ऋद्धि का प्रयोग करते हुए शरीर बड़ा किया और जमीन नापना शुरू किया। पहले डग में सुमेरू पर्वत और दूसरे को मानुषोत्तर पर्वत पर रखा। 
जब तीसरे डग के लिए जमीन नहीं बची तो उन्होंने बलि से कहा अब क्या करूं तो बलि ने कहा अब मेरे पास जमीन तो नहीं है आप मेरी पीठ पर डग रख लीजिए। मुनि ने तीसरा डग बलि की पीठ पर रखा तो बलि कांपने लगा। देव व असुरों के आसन कंपायमान हो गए। सभी अवधि ज्ञान से वृत्तांत जान वहां आए और मुनि से क्षमा की प्रार्थना की। मुनि ने बलि की पीठ से चरण हटाया और असली रूप में प्रकट हुए। उसी समय बलि ने यज्ञ बंद कर मुनियों को उपसर्ग से दूर किया। राजा भी मुनि के दर्शनार्थ वहां पहुंच गए। 
नगरवासी सभी श्रावकों ने मुनियों की वैयावृत्ति की उनकी सेवा की और मुनियों को चैतन्य अवस्था में लाए। मुनि पूर्णतः स्वस्थ हो आहार पर निकले तो श्रावकों ने खीर, सिवैया आदि मिष्ठान्न आहार हेतु बनाए थे। मुनियों को आहार करा श्रावकों ने भी खाना खाया और खुशियां मनाई। 
यह दिन श्रावण मास की पूर्णिमा का दिन था। इसी दिन मुनियों की रक्षा हुई थी। इस दिन को याद रखने के लिए लोगों ने हाथ में सूत के डोरे बांधे। तभी से यह रक्षाबंधन के पर्व के रूप में माना जाने लगा। इसके बाद विष्णुकुमार मुनि ने गुरु के पास जाकर अपने दोषों को बताया और महान तप किया। आज भी जैनियों के घरों में इस दिन खीर बनाई जाती है और विष्णुकुमार मुनि की पूजा तथा कथा के बाद रक्षाबंधन का पर्व मनाया जाता है।
✍🏻रूपेश अजित सौजना

जिनधर्म एवं जैन धर्म का संरक्षण वर्तमान परिपेक्ष्य में !

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शास्त्री रूपेश अजित सौजना
; इम्फाल मणिपुर मो. 9468626114
विषय बहुत ही मार्मिक है क्योंकि बात जिन धर्म,जैन संस्कृति और वर्तमान तीनों की है और मैं अपनी बात मध्य से प्रारम्भ करता हूं क्योंकि मध्य में ही प्रथम विषय सन्निहित हो जायेगा जिन संस्कृति जैन संस्कृति अनादिकालीन अनादिनिधन है लेकिन वर्तमान की शिक्षा की पद्धति बदलने के कारण वर्तमान की युवा पीढी है जो कि विशेष शिक्षाओं से सम्पन्न है देश देशांतरों की संस्कृतियों को देखने वाली है वह आज इसे समझ नहीं पा रही है या दिग्भ्रमित हो रही है मैं खासकर उन्हीं युवाओं को लक्ष्य में ले कर लिख रहा हूं।
जैन संस्कृति मूल रूप से वैज्ञानिक तथ्यों के आधार पर खरी उतरने वाली है लेकिन अफसोस है कि इसके प्रचार प्र्र्रसार में बहुत ही कमी कर दी है बल्कि होना ये चाहिए था कि समय के साथ साथ इसमें और तीव्रता होनी चाहिए थी यदि किसी भी…

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जिनधर्म एवं जैन धर्म का संरक्षण वर्तमान परिपेक्ष्य में !

  


शास्त्री रूपेश अजित सौजना
; इम्फाल मणिपुर मो. 9468626114
विषय बहुत ही मार्मिक है क्योंकि बात जिन धर्म,जैन संस्कृति और वर्तमान तीनों की है और मैं अपनी बात मध्य से प्रारम्भ करता हूं क्योंकि मध्य में ही प्रथम विषय सन्निहित हो जायेगा जिन संस्कृति जैन संस्कृति अनादिकालीन अनादिनिधन है लेकिन वर्तमान की शिक्षा की पद्धति बदलने के कारण वर्तमान की युवा पीढी है जो कि विशेष शिक्षाओं से सम्पन्न है देश देशांतरों की संस्कृतियों को देखने वाली है वह आज इसे समझ नहीं पा रही है या दिग्भ्रमित हो रही है मैं खासकर उन्हीं युवाओं को लक्ष्य में ले कर लिख रहा हूं।
जैन संस्कृति मूल रूप से वैज्ञानिक तथ्यों के आधार पर खरी उतरने वाली है लेकिन अफसोस है कि इसके प्रचार प्र्र्रसार में बहुत ही कमी कर दी है बल्कि होना ये चाहिए था कि समय के साथ साथ इसमें और तीव्रता होनी चाहिए थी यदि किसी भी प्रकार से इसका प्रचार प्रसार यदि हो रहा है तो वह बहुत ही नगण्य स्थिति में है जो प्रचार प्रसार भगवान महावीर स्वामी के 2600वें जन्मकल्याणक के अवसर पर हुआ था ऐसा कुछ निरन्तर करते रहने की आवश्यकता है क्योंकि वर्तमान पीढी वैज्ञानिक तर्कों को जानती है और वह वैज्ञानिक तथ्य अधिकांश विद्वानों,मुनियों,श्रावकों के पास ना होने के कारण भावावेश में आ कर वे या तो प्रश्नकर्ता को कुतार्किक सिद्ध करने में लग जाते हैं या फिर सीधा नास्तिक ही सिद्ध कर देते हैं यह मुख्य वजह है जिससे नव युवा पीढी जैन जीवन शैली से मुंह फेर रही है इसलिए वह पूर्वाचायों के कथनों को भी वह एक रूढी मात्र ही मानती है इसलिए हम सभी का प्रथम दायित्व है कि हम किस प्रकार से पूर्व में दी हुर्ह सामग्री को खोल कर वैज्ञानिक तथ्यों के आधार पर युवाओं को सौंप पाते हैं क्योंकि सर्वे किया जाये तो भारत मैं जैन संस्क्ति को स्वीकार करने वालों की संख्या अल्पअतिअल्प ही है लेकिन विदेशों में इनकी संख्या लगातार बढ रही है आज जिन्हें हम वीगन की परिभाषा में शाकाहारी समझते हैं वह मुख्यरूप से जैन संस्क्ति का ही विशेष प्रभाव हैं। मेरा समझता हूं कि भारतवर्ष में या अन्य जगह देश देशान्तरों में स्थानिय स्तर पर जो विद्वतगण निवास कर रहे हैं और जो सामाजिक,राजकिय,राष्ट्रिय,अर्न्तराष्ट्रिय स्तर पर जो विद्वान कार्यरत् हैं वह इस कार्य को बखूबी कर सकते हैं क्योंकि बात करें जिनधर्म की तो इसे हमें धर्म नाम के संकुचित दायरे से बाहर निकाल कर जीवनकला के व्यापक दायरे में लाना चाहिये चाहे वह टेलीविजन मीडिया हो या प्रिंट मीडिया या सोशल मीडिया हो इन सब के माघ्यम से व्यापक स्तर पर प्रचारित प्रसारित करना चाहिए जैसा कि वर्तमान में धर्म के नाम पर जो कुछ चल रहा है धर्म और मंदिरों के नाम पर इस प्रकार का व्यापारिक मुद्दा न बनने दें इस सब को देख कर आज के बच्चे और ज्यादा घबडाते हैं आज हम टीवी चैनलों पर देखते हैं कि जगह जगह मंदिर निर्माण की होड लगी है सब जगह से शांतिधारायें प्रसारित करवा कर प्रत्येक कार्यों की राशियां फिक्स करके दान मंगाया जा रहा है इस कार्य में मेरा मत है कि जिनालय भी आवाश्यक हैं और जिनधर्म के पालनकर्ता भी आवाश्यक हैं लेकिन वर्तमान में हम सब देख रहे हैं कि जैनियों में भी जिनधर्म पालन करने की बात तो दूर रही मंदिर जी जाने वाले लोगों की भी संख्या अल्प ही रह गई है।
लेकिन चर्च,मस्जिद या अन्य मतावलम्वियों के मंदिर जाने वालों की संख्या जैन समाज में प्रतिदिन बढ रही है वहां जाने से उन्हें कोई गुरेज नहीं है इसलिए अब हमारी प्राथमिकता जिनालयों को छोड कर हमारी शिक्षा पद्धति पर होना चाहिए शिक्षा ऐसी हो जो
प्।ै च्ब्ै प्च्ै डठठै ठभ्डै ठ।डै डठ। क्स्प्ज् ब्व्डच्न्ज्म्त् डच्भ्प्स् च्भ्क् ब्। प्प्ज् म्छळप्छम्म्त्ष्ै ।क्टव्ब्।ज्म्ष्ै श्रन्क्ळम्ै ैब्प्म्छज्प्ैज्ै ठण्ब्व्ड डण्ब्व्ड आदि जैसी उच्च गुणवत्ता पूर्ण शिक्षा दे सके जो संस्थान सफल व्यवसायी उधोगपति निकाल सकें। इसके लिए अब हमें बडे स्तर पर जैन हाईस्कूलस्, इंटरमीडियेट स्कूलस इंस्टीटयूट्स युनिवर्सिटीज आदि तैयार करने की आवश्यकता है क्योंकि आज जो संस्थान चल रहे हैं वह अभी तक फ्री आफ कॉस्ट होने के कारण वर्तमान में आवाश्यक उच्च गुणवत्तापूर्ण उच्च दर्जे की शिक्षा प्रदान नहीं कर पा रहे हैं इसलिए हम सब समाज को इस बारे में जाग्रत करें उन्हें बतायें कि जैन संस्कारों,श्रावक संस्कारों के साथ उच्च शिक्षा का प्रयास और प्रबंध करना चाहिए आज के समय में 8वीं से 12वीं तक के बच्चों के लिए ही अच्छी शिक्षा दिलाने के लिए 1 लाख से 5-7 लाख रुपये तक खर्च करने पडते हैं और इसी के साथ जहां बच्चों को हॉस्टलों में रखा जा रहा है वह लगभग 70 प्रतिशत तक कैथोलिक पद्धति से संचालित किये जा रहे हैं जहां मांस आदि अभक्ष्य वस्तुओं के खान पान की तरफ बच्चों को आकर्षित करके उन्हें भारतिय परम्पराओं से च्युत किया जा रहा है और यह भी परम सत्य है कि भारत में निवासरत सबसे छोटी कम्युनिटी होने के बावजूद भी क्रिश्चियन कम्यूनिटी का भारत की 60 से 65 प्रतिशत शिक्षा व्यवस्था पर कब्जा है जो विस्तारवादी नीति होने के कारण बहुत ही चिंतनिय विषय है। जैन दम्पत्यिं को भी जैन समाज के कोई उच्च शिक्षा संस्थान न होने के कारण विवस होकर ऐसे संस्थानों में बच्चों को न चाहते हुए भी भेजना पड रहा है।
जिस प्रकार से हमने विगत दो दशकों का समय हमारे मंदिरों के साज सज्जा और मंदिरों की प्राचीरों को खडा करने में लगाया है तो मैं कहता हूं कि यदि मात्र एक दशक का समय ही हम हमारी शिक्षा व्यवस्था पर जोर दे दें तो वर्तमान में दिख रही अव्यवस्थाओं का काया पलट हो जायेगा जब शिक्षा पद्धति बदलती है तो मानसिकता बदलती ही है यही कारण है कि वर्तमान में युवा पीढी की मासिकता पश्चिमी सभ्यता के समान स्वछंद होती जा रही है अब हमें चाहिए कि इस व्यवस्था को संकल्पबद्ध होकर बदलना ही होगा पहले हम वर्तमान में उपयोगी सिद्ध हो रही शिक्षा के साथ जैन जीवन शैली का समन्वय करके ऐसे संस्थान खोलें। कोटा,हैदराबाद की समाजों ने तत्परता के साथ कुछ अंश तक कार्य करने का प्रयास किया है लेकिन हमें इनके अलावा भी सभी मेट्रो सिटियों,महानगरों एवं सभी राज्यों की राजधानियों में इस प्रकार के संस्थान खोलना आवश्यक हो गया है इन संस्थानों से मेरा मंतव्य शिक्षा के साथ निवास स्थान भी है जहां शुद्ध भोजन के साथ के साथ सुबह शाम की एक फ्रेंकली रिलिजिन क्लास या आर्ट ऑफ लिविंग क्लास का समाव्रश होना चाहिए जहां तक मेरा विचार है कि यह कार्य सर्व साधारण रूप से सभी जगह की समाजों के मंदिरों में भी कर सकते हैं भले ही यदि कोई श्रावक व्यवसाई प्राईवेट स्तर पर भी यह कार्य कर रहे हैं या करना चाहते हैं तो उन्हें भी बढावा दें। इसके साथ एक और कार्य है कि जो बच्चे स्वतंत्र रूप से बडे शहरों में अकेले अध्यन अध्यापन का कार्य या अकेले नोकरियां कर रहे हैं उन्हें शुद्ध भोजन की व्यवस्था उपलब्ध करायें।
शिक्षा के पश्चात बात आती है विवाह संस्कारों की यह वर्तमान में बहुत बडा मुद्दा बन चुका है जिस प्रकार से जैन समाज में बेटियों की कमी बताई जा रही है वास्तविक रूप से यदि इसे जमीनी स्तर पर देखा जाये तो ऐसा बिल्कुल भी नहीं है मातापिता के अरमानों ने अच्छे लडकों और बेटियों की कमी बना रखी है बल्कि होना ये चाहिए कि नियति को स्वीकार करके सामाजिक व्यवस्थाओं में सभी को अपना अपना योगदान देना चाहिए। पोस्टग्रेजुएसन तक की शिक्षा का ध्यान रखते हुए भी विवाह के लिए लडके की अधिकतम उम्र 25 से 28 वर्ष एवं लडकियों की अधिकतम उम्र 22 से 25 वर्ष रखना चाहिए लडके लडकियों की अधिक उम्र तक विवाह नहीं होने के कारण विजातिय विवाहों के केश या लडकियों के अन्य समाज के लडकों के साथ भाग कर विवाह रचाने क केश सभी के लिये खूब सुनने और देखने मिल रहे हैं इसी के साथ जो लडके लडकियां 35 वर्ष की उम्र में मातापिता बनेंगे वह दम्पत्यिं संतान का वह सुख कभी भी नहीं भोग सकते जिसे आप या आपके पूर्व की पीढियां भोग चुकीं हैं और एक खास उम्र के बाद एक दूसरे में ढलने की या समझने भी गुंजाईसें बिल्कुल कम हो जातीं हैं इसके लिए जैन समाज के सभी विद्वतगण और सभी गणमान्य महानुभाव एवं सभी सामाजिक संस्थायें अपना ध्यान आकर्षित करके अखिल भारतिय जैन समाज के स्तर पर जन सम्पर्क आन्दोलन चला कर समाज को जागरूक करें जगह जगह जैन विवाह सम्मेलन,युवा प्रतिभा सम्मान,जैन युवा परिचय सम्मेलन करावें ।
इसके पश्चात बात आती है समाज की वर्तमान में टूटता हुआ समाज बहुत बडी चिंता का विषय है जिसका प्रमुख और पहला कारण है संतवाद और पंथवाद दूसरा कारण समाज में सन्निहित होती एकल परिवारों की पद्धति तीसरा कारण स्वयं के मान की पुष्टि करने के लिए एक दूसरे को धार्मिक सामाजिक और व्यापारिक स्तर पर एक दूसरे को नीचा दिखाने की प्रवृत्ति इसलिए अब हमें बहुत जरूरी है कि समाज का एकता के बन्धन में बांधे ऐसे लोगों को समाज के उच्चपदों पर आसीन करें जो समाज के प्रत्येक वर्ग को समझ सकें सबकी भावनाओं को समझ कर समाज को आगे बढाने का कार्य कर सकें जिनके पास निर्णय लेने की शक्ति हो जो स्वयं से पहले समाज के लिए सोचें और जो सन्तवाद,पंथवाद और ग्रंथवाद से उपर उठकर एकतावाद,मित्रवाद और सहयोगवाद को बढावा दे सकें जो किसी भी प्रकार की वैमनस्यता के एक दूसरे के सुख दुःख में शामिल हो सकें जो समाज के प्रत्येक वर्ग को विश्वास और अहसास दिला सकें कि समाज का हर एक सदस्य एक दूसरे के साथ है जो समाज की प्रगति का सपना देखते हों ऐसे लागों को आगे लाऐं।
और सम्पूर्ण लेखन का सार यह है कि हम सभी लोग शिक्षा के माध्यम से जिन धर्म और जैन संस्कृति को वर्तमान ही नहीं बल्कि लम्बे भविष्य के लिए भी संरक्षित कर सकते हैं।
प्रस्तुत सामग्री अनुभव के आधार पर लिखी गई है पाठकगण अपनी रुचि अनुसार ग्रहण करें।

!!धन्यवाद!!

जीवन का मूल्यांकन

मन में विचार आता है कि –
जीवन का मूल्यांकन करना चाहिए लेकिन विचार करने के बाद विकल्पों का अम्बार मन में पुनः पुनः उत्थान पतन का रूप ले लेता है!
आखिर जीवन का मूल्यांकन क्यों ?
क्या आवश्यकता है जीवन के मूल्यांकन की ? और फिर मूल्यांकन भी करूं तो किस आधार पर करूं ?
लेकिन यह भी सत्य है जब तक हम किसी वस्तु का मूल्यांकन नहीं करते तब तक हमें उस वस्तु की वास्तविकता या उपयोगिता का पता ही नहीं चलता कि हम उसे किस मात्रा में किस प्रकार किस आधार पर या कितना उपयोग करें कि भविष्य में उसका अच्छा परिणाम मिले या हम उसका अच्छे से उपयोग कर सकें या पूर्ण रूप से उपयोग कर सकें।
तो यह जो जीवन है इसे हम पहले चार भागों में विभाजित करते हैं ताकि हमे पता चले कि हम किस आधार पर जीवन का मूल्यांकन करें और इसकी उपयोगिता का अहसास कैसे करें।
1- हमारा जन्म क्यों ?
2- इसका कितना समय निकल चुका है ?
3- वर्तमान में कैसा जीवन यापन कर रहे हैं ?
4- जो जीवन हम यापन कर रहे हैं इसकी कितनी सार्थकता है ?
1 – अब हम ध्यान देते हैं कि वास्तव मे हमारा जन्म क्यों हुआ ? क्यों मिला है हमे यह मनुष्य जन्म ? यह जीवन हम अभी तक बिना किसी लक्ष्य को क्यो यापन कर रहे हैं ?
इस प्रश्न का समाधान पाने के लिए विभिन्न पद्धतियो से गुजरना पडेगा क्योंकि हम जिस वातावरण मे रहते हैं वह वातावरण मिश्रित है यहां की संस्कृति मिश्रित है इसलिए अपने विचारो को शुद्ध बनाने के लिए अच्छा बनाने के लिए पहले जो अवरोधक हैं उनको बाहर निकाल कर रखना होगा।
तो मैं कहता हूं कि हमारा जन्म मनुष्य पर्याय मे क्यों हुआ ?
तो आईये पहले विचार करते हैं कि किस संस्कृति के आधार पर व्यक्ति अपना मूल्यांकन करता है और किसके विचारों से सम्मत होकर अपने जीवन को अच्छा बनाने की कोशिश करता है ?
1- हम जिस परिवेष मे रहते हैं वह परिवेश हमको और हमारी जीवन शैली को ब्रम्हवाद की और आकर्षित करता है! इस पद्धति में कर्ता यानि कि रचनाकार, जो कर्म करने वाला स्वयं नहीं होता है इसमे रचनाकार ब्रम्हा नामक किसी विशेष व्यक्तित्व को ही प्रमुख माना जाता है जो सबकी कर्म सत्ता को परिसंचालित करता है इसमें मनुष्य मात्र कठपुतली की तरह होता है जैसा उसको ब्रम्हा कार्य करवायेगा वैसा ही कार्य वह व्यक्ति करेगा यानि कि ब्रम्हा नामक सत्ता ने जो कार्य पहले से नियुक्त कर दिया है वैसा ही कार्य मनुष्य करेगा लेकिन ऐसा नहीं है। फिर क्या है ?
2- आईये इसी परिवेश के साथ हम दूसरी और भी विचार करते हैं तो इसी परिवेश मे रहने वाले कुछ मिश्रित लोग मानते है कि ’’ खाओ पिओ मौज करो कल को किसने देखा है,, तो इस आधार पर तो चींटी भी अपना पेट भर लेती है चिडिया को भी दाना कहीं न कहीं से मिल ही जाता है तो फिर ऐसा निरर्थक जीवन जीने का हमारा क्या उद्देश्य रहा।
3- अब हम बात करते हैं जैन संस्कृति की जैन संस्कृति ही एक ऐसी संस्कृति है जो न कि वतर्मान को ही देखती है बल्कि भूत और भविष्य को भी देखती है और साथ ही साथ जैन दर्शन किसी को कर्ता नहीं मानता जो बिल्कुल सही भी है यदि हम किसी अन्य को सृष्टि का रचनाकार मानें या स्वयं के जीवन में हुए परिवर्तनों को किसी अन्य की देन समझें तो हमे एक पहलू पर विचार अवश्य करना चाहिए कि कोई पिता अपने पुत्र को जन्म देकर कैस मार सकता है ? यदि उत्तर नहीं है तो हमारा कोई बनाने वाला भी नहीं है स्वयं अपने कर्मों के आधीन ही हमारा जन्म भिन्न भिन्न गतियों मे हो रहा है इसलिए यह सिद्ध होता है कि निश्चित तौर पर अपने जीवन के आगे की यात्रा को और सुन्दर बनाने के लिए ही हमारा जन्म हुआ है।
2 – हमारा समय कितना निकल चुका है ?
अब हमे हमारा लक्ष्य मिल चुका है कि हमे जो जन्म मिला है उसके माध्यम से आगे की जीवन यात्रा को और सुधारना है !
तो इसके बारे में हमे निरन्तर विचार करते रहना चाहिए जैसे कि किसी यात्रा के दौरान प्लेटफार्म पर अपने डिब्बे की प्रतीक्षा में आगे के डिब्बे आगे निकल जाते हैं तब हम अपने डिब्बे को जल्दी से पकडते हैं ताकि पीछे के डिब्बे भी न निकल जाएं और हम अपने लक्ष्य/गंतव्य स्थान तक आसानी से पहुंच जाएं इसी प्रकार जो समय निकल चुका है वह आगे के डिब्बे थे अब हमे अपने डिब्बे मे यानि कि आज के समय को पकड कर जीना सीख लेना चाहिए क्योंकि जो वर्तमान को पकड कर चलता है वही अपने भविष्य का सुन्दर निर्माण कर पाता है।
3 – हम वर्तमान में कैसा जीवन यापन कर रहे हैं ?
वायु का वेग कैसा भी हो नदी दोनों तटों की यथावत स्थिति रखते हुए स्वयं कभी वेग से तो कभी मद्धम मद्धम अपने ही स्वर मे कल कल स्वर को गुनगुनाती हुई प्रवाहित होती ही रहती है उसके बीच मे अवरोधक बनने वाले पेड पौधे पत्थर कंकड चट्टान या पानी पीने वाले जीवजन्तु किसी से भी उसे कोई सरोकार नहीं होता ठीक इसी प्रकार हमे हमारा जीवन रखने की और बनाने की आवश्यकता है अवरोधक कई मिलेंगे कोई गिरायेंगे तो कोई रुकायेंगे लेकिन जिम्मेदारी हमारी है कि हम लोगां के द्वारा दी जाने वाली प्रतिक्रियाओं को कैसे लेते है अपने जीवन के उत्थान के लिए या पतन के लिए हम वहीं उसी स्थान पर पूर्ववत् अवस्था में पडे पडे अपने भाग्य को दोष देते हैं या उठकर पुरुषार्थ पूर्वक अपने भाग्य को बनाते हैं।
निश्चित तौर पर हमारी वृद्धि में,तरक्की में रुकावट होने का कारण यही अवरोधक थे और रहेंगे पर सबसे पहला कारण तो यह है कि हमने अपने आत्मिक बल को बढाने का प्रयास ही नहीं किया हमने अपनी नकारात्मक सोच के कारण अपने आप को नकारात्मक उर्जा से भर दिया है लेकिन अब हमारा प्रमुख दायित्व बनता है कि हमे अपने जीवन को सही दिशा देना है हमे स्फूर्तीमान,तरोताजा जीवन जीना है तो! सकारात्मक सोच के साथ साथ बिना किसी से अपेक्षा किए नए जीवन की नई प्रभात को प्राप्त करने से पहले इस राह में हमे अपना कदम बढाना होगा।
4 – जो जीवन हम यापन कर रहे हैं वह हमे कहां तक पहुंचायेगा ?
अब हम बात करते हैं वर्तमान मे जिए जाने वाले जीवन की कि निश्चित तौर पर जो जीवन कुछ पाने के लिए ही जिया जाता है उससे हासिल होकर भी कुछ हासिल नहीं होता।
रुपया,पैसा,मान,प्रतिष्ठा,सम्पत्ती,प्यार,शांति,कलंक रहित जीवन या पूर्व में प्राप्त हुए मोक्ष इनमें से हमारा जीवन किसी न किसी के उपर निर्भर है भोजन करना है तो मां,वैटर,या होटल कुछ सीखना है तो गुरू के उपर कुछ आसक्तियां पूर्ण करनी है तो अन्य अन्य जीवो या वस्तुओं के उपर और कुछ पाना है तो मूर्तियों की देखभाल करने वाले धूर्त मायावी पाखण्डी चौकीदारों बाबाओं,पण्डितो या मौलवियों के उपर अरे भाई जब भगवान वीतरागी है तो राग कैसा ? उसके द्वारा तुम्हारी इक्छाओं की पूर्ती कैसी ? और यदि वह यह सब करता है तो वीतरागी कैसा ?
वह परमात्मा तो शांत है निस्तरंग है जिस मार्ग को शांति के लिए उसने अपनाया है वह मार्ग अपनी शांति की प्राप्ति के द्वारा बतलाने वाला है इसलिए भगवान तो क्या किसी से भी कोई अपेक्षा नहीं की जा सकती चलना स्वयं को है करना स्वयं को है क्योंकि आपके या हमारे पास जो भी है या नहीं है वह सब आपका हमारा स्वयं का किया हुआ पुरुषार्थ है जो पुरुषार्थ हमने सही दिशा में किया उसका सही परिणाम मिला जो गलत दिशा में किया उसका गलत परिणाम !
अच्छा एक और बात कि हमारे जीवन मे जो भी अच्छा या बुरा घटित हो रहा है हमारे सुख या दुःख मे जो भी न्युनाधिकता आ रही है वह भी हमारा ही पुरुषार्थ है किसी और का नहीं क्योंकि जो जैसा करता है वह वैसा ही पाता है इसलिए वर्तमान को सजग विद्यार्थी,तपस्वी,व्यापारी और प्रहरी की तरह जीना प्रारम्भ करें! क्योंकि-
त्रिया चरित्रम पुरुषस्य भाग्यम्,देवो न जानति कुतो मनुष्या।।
कब आपका भाग्योदय हो जाए आपके अपने पुरुषार्थ के बल पर कुछ कहा नहीं जा सकता इसलिए सही दिशा मे कार्य करना प्रारम्भ करें।

दान का पर्व अक्षय तृतिया

जैन धर्म मे अक्षय तृतिया का बहुत बडा महत्व है।
यह पर्व बैशाख शुक्ला तृतिया को मनाया जाता है
यह पर्व वर्तमान चौबीसी के नायक प्रथम तीर्थंकर 1008 आदिनाथ भगवान/ऋषभदेव के समय से प्रचलित है ।
जैन शास्त्रौं के अनुसार जब महाराजा आदिकुमार ने दिगम्बर जैनेश्वरी दीक्षा धारण की जब वह छैः माह उपवास का नियम लेकर मौन पूर्वक तपस्या करने बैठे थे छैः माह पूर्ण होने के पश्चात जब वह आहारचर्या के लिये अयोध्या की ओर गये तो आहारचर्या की विधी किसी को पता नहीं हाने के कारण प्रथम आहार नहीं हो पाया ओर महामुनिराज आदिनाथ वापिस वन जाकर छैः माह का उपवास का नीयम लेकर तपस्या करने बैठ गये पुनः छैः माह बीत जाने पर आदि प्रभू आहार चर्या के लिये निकले और हस्तिनापुर नगर पहुंॅचे वहां क राजा सोम और श्रेयांश राजमहल की छत पर टहल रहे थे कि उन्होने आदिनाथ भगवान को सिंहमुद्रा/आहारचर्या की मुद्रा में आते देख उन्हे अपना पुर्व जन्म याद आ गया और तुरंत ही नीचे उतर कर हे स्वामी अत्र अत्र अत्र तिष्ठ तिष्ठ तिष्ठ कह कर पडगाहन किया तीन परिक्रमाऐं देकर भोजनशाला में प्रवेश कराया और उच्चासन पर विराजमान किया पाद प्रक्षालन किया अष्ट दृव्य से पूजा की और मन शुध्दि वचन शुध्दि काय शुध्दि आहार जल शुध्द है कहकर इक्षु रस/गन्ने के रस से भरे हुए कलश से पाडना/प्रथम आहार कराया और देवों के द्वारा 1 रत्न वृष्टि 2 पुष्प वृष्टि 3 दुंदुभी बजना 4 मन्द मन्द सुगन्धित वायू का चलना 5 अहो दनाम् अहो दानम् शब्दों का उच्चारण ये पंचाश्चर्य प्राप्त किये और 13 माह के पश्चात आदिनाथ भगवान के आहार सम्पन्न हुए।
इस प्रकार आदिनाथ भगवान के द्वारा धर्मतीर्थ और राजा श्रेयांश के द्वारा दानतीर्थ का प्रर्वतन हुआ।
यह दिन सभी शुभ कार्यो के लिये स्वयं सिघ्द मुहूर्त माना जाता है।
इसदिन हमें मुनि आर्यिका श्रावक श्राविका रूप चतुर्विध संघ को आहारदान दान तीर्थ के प्रर्वतन में सहयोग अवश्य करना चाहिये।
इसदिन पक्षियों को दाना पानी के लिये सकोरे बांधना चाहिये।
गायों को घास पानी की व्यवस्था करना चाहिये।
शास्त्री रूपेश अजित
9468623114

सूतक पातक समाधान


सूतक पातक एक दृष्टि में-
जन्म,मरण एवं ऋतुकाल या इनका संसर्ग/ स्पर्श करने से जो अशुद्धि होती है उसमें धार्मिक कार्य एवं
आहारदान आदि करने का निषेध अनेक शास्त्रों में उल्लेखित है।
1- मरण सम्बंधी
2- प्रसूति सम्बंधी
3- ऋतुकाल सम्बंधी
4- सूतक से अशुद्ध व्यक्तियों के स्पर्श सम्बंधी

सूतक पातक के कारण होने वाले हर्षातिरेक या विषादातिरेक में विकारी भावों के उद्वेलन से प्रमाद एवं
अविवेक होने लगता है जो हिंसा का कारण है या बन जाता है इसकी तीव्रता तथा काल रागादिक
परिस्थितियों पर निर्भर करता है।
इसके प्रमाण अनेक ग्रंथों जैसे- महापुराण,भगवती आराधना,जैन व्रत विधान संग्रह,त्रिलोकसार,
लाटी संहिता,सूतक विधि,बोध प्रार्भतम्, अनगार धर्मामृत आदि ग्रंथों में पर्याप्त रूप से प्रमाण
उल्लेखित हैं-
प्रमाण संख्या 1- दुब्भाव असुचिसूदगपुप्फवई जाइसंकरादीहिं ! – त्रिलकसार 124

प्रमाण संख्या 3 – सूतकं पातकं चापि यथोक्तं जैनशासने।
एषणा शुद्धि सिद्धयर्थं वर्जयेच्छ्र्रावकाग्रणी ।। -लाटी संहिता 2/251

प्रमाण संख्या 2- दीनस्य सतिकायाश्च छिम्पकस्य विशेषतः ।
मद्यविक्रियिणो मद्यपायिसंसर्गिणश्च न ।। – बोध प्राभ्रतम्

प्रमाण संख्या 4- शवादिनापि क्लीवेन दत्तं दायक दोषभाक् ! – 15/24 अनगार धर्मामृत

प्रमाण संख्या 5- कुटुम्बीनां सूतके जाते गते द्वादसके दिने ।
जिनाभिषेक पूजाभ्यां पात्रदाने शुद्धय्ति ।। -सू़तक विधि पृ. 251

प्रमाण संख्या 6- चतुर्थे दशरात्रिः स्यात् षड्रात्रिः पुंसि पंचमे ।
षष्ठे चतुरहः शुद्धिः सप्तमे च दिनत्रयम् ।।
अष्टमे पुंस्यहोरात्रिः नवमे प्रहर द्वयम् ।
दशमे स्नानमात्रं स्यादेतत् गोत्रस्य सूचकम् ।। -सूतक विधि पृ. 28
इनके अतिरिक्त और भी अनेक दृष्टांत सूतक पातक के सन्दर्भ में आगम के आलोक में प्रकाशित हो रहे हैं परन्तु विषय की सूक्ष्म विस्तारता को ध्यान में रखते हुए कुछ ही दृष्टांत दिये गये हैं ।
अशुद्धि किसे होगी ?
सूतक पातक का प्रभाव वंश व गोत्र के अनुसार लगता है अतः सम्पत्ती के बंटवारे या अन्यस्थान या विदेश मे रहने ,पारिवारिक वैमनस्यता,व्यापार आदि अलग अलग होने पर भी इसका दोष लगेगा ।
अशुद्धि में क्या नहीं करना चाहिए ?
जिनाभिषेक,पूजा,दृव्य चढाना,रसोई में कार्य,मुनि एवं व्रतियों को आहारदान ,वैयावृत्ति एवं अन्य
धार्मिक अनुष्ठान आदि क्रियायें नहीं करना चाहिए ।
अशुद्धिकाल में बाहर से मानस्तम्भ के ही दर्शन करना चाहिए यदि मानस्तम्भ नहीं है तो अन्दर प्रवेश तो करें लेकिन गर्भग्रह में न जायें और मन्दिर की किसी भी वस्तु को स्पर्श न करें ।
विशेष-
रजस्वला स्त्री पांच दिन से पहले मानस्तम्भ के भी दर्शन करने योग्य नहीं है एवं पांच दिन स्वस्थ स्त्री के लिए कहा गया है किन्ही किन्हीं महिलाओं को सातवें या आठवें दिन भी रक्तस्राव की आशंका बनी रहती है इसलिए इस स्थिति में महिलाऐं विवेक रखें कि शल्यनिवारण के पश्चात पूर्ण शुद्धि में ही मन्दिर में प्रवेश करें या धार्मिक क्रियायें सम्पादित करें ।
अशुद्धि किसको नहीं होगी ?
विवाहिता पुत्री एवं विवाहित बहन को अशुद्धि नहीं होगी एवं अशुद्धि के पूर्व सकलीकरण करके जाप एवं अनुष्ठान में संलग्न सभी पात्रों को इनका दोष नहीं लगता ।
नोट- केवल रक्षासू़त्र बांधने से सूतक पातक के दोष का परिहार नहीं होगा ।
गर्भवती महिलाऐं पांच माह तक विधान अनुष्ठान एवं आहारदान कर सकतीं हैं और दैनिक देव दर्शन एवं पूजा प्रसूति के दिन तक कर सकतीं हैं ।

सूतक पातक की स्थिति में दान राशि बोल सकते हैं सामाजिक बोली आदि के कार्यों में सहभागिता कर सकते हैं लेकिन बोली में बोला गया दान सूतक पातक की अवधि के निकलने के बाद मे ही दे सकते हैं ।
आत्मघात के सूतक में विभिन्न मत हैं-
वर्तमान आचार्यों एवं वरिष्ठ विद्वानों का मत है कि छैः माह का सूतक उसी परिवार का लगेगा जिस परिवार में घटना घटी है शेष परिवारजन जिनका खानपान व्यापार आदि अलग अलग है उन्हें सामान्य सूतक लगेगा ।
और सूतक किसे नहीं लगेगा ?
जो परिवार व्यापार,पत्राचार एवं फोन आदि का त्याग करके तीर्थयात्रा पर संकल्प पूर्वक जाते हैं तो परिवार में होने वाले सूतक पातक का दोष उन्हें नहीं लगेगा ।
यदि सकलीकरण वाला पात्र अशुद्ध स्थान पर जाता है या सूतक पामक से सहित व्यक्तियों से सम्पर्क रखता है तो वह व्यक्ति भी अशुद्ध माना जायेगा ।
प्रायश्चित संग्रह पृष्ठ संख्या – 152 श्लोक संख्या 124,125,126 में अशुद्धि काल मे नीरस या अचाम्ल / फीका चावल और अमचूर या आम का रस का आहार लेते हुए मौन पूर्वक अपने सभी आवश्यक कार्यो को सम्पादित करने का विधान कहा गया है
रजोनिवृत्ति/मासिकधर्म के पश्चात स्नान कर गुरु के पास जाकर प्रायश्चित ग्रहण करके पुनः
व्रतारोपण करने का विधान है । सूतक पातक के दिन की गणना दाह संस्कार से न करके मरण दिवस से या जन्म दिवस से करें । सूतक पातक के विषय में कई क्षेत्रिय परम्परायें प्रचलित हैं ।
पीढी के निर्धारण में भी विभिन्न मान्यतायें हैं लेकिन वरिष्ठ आचार्य/मुनिराजों एवं विद्वानों के मतानुसार यदि एक ही दादाजी के पुत्र एवं पौत्र की पीढी में सूतक पातक है तो दादाजी से ही पीढी का गिना जायेगा और यदि दादाजी के चचेरे भाईयों की पीढी मे सूतक पातक है तो दादाजी के पिताजी से पीढी को गिना जायेगा ।
जैसे – 1- पीढी की गिनती के लिए यदि रमेश के पुत्र सुरेश के यहां सूतक पातक की स्थिति बनती है और अजित के पुत्र विमल के यहां सूतक पातक की गणना करनी है तो महावीर प्रसाद से गणना की जायेगी
2- यदि सूतक पातक जगमोहन के पुत्र किशोर के यहां पर होता है और उसकी गणना महावीर प्रसाद से करना है तो गणना प्रकाश से शुरु की जायेगी ।
3- यदि महावीर प्रसाद के घर सूतक पातक की स्थिति है तो आकाश के परिवार में सूतक पातक की गणना महावीरप्रसाद से की जायेगी

र्सूतक पातक समाधान चार्ट

  अवसर          जन्म         मरण  विशेष/अन्य ग्रंथ से       
3 पीढी तक    10 दिन  12 दिन  पहली पीढी दादाजी की दूसरी पिताजी की तीसरी पीढी स्वयं की कहलाती है।;जीवित हों या न होंद्ध

4 पीढी में    10 दिन  10 दिन  6 दिन मरण 5 दिन जन्म ;जैन व्रत विधान संग्रह पूजन पाठ प्रदीपद्ध
5 पीढी में     6 दिन   6 दिन   5 दिन जैन व्रत विधान संग्रह जन्म 4 दिन जिन भारती संग्रह पूजन पाठ प्रदीप श्रावकाचार संग्रह भाग 4द्ध  मरण 5 दिन श्रा‘ सं‘
5 पीढी में    4 दिन   4 दिन   जन्म 3 दिन मरण 4 दिन श्रा‘ सं‘
7 पीढी में    3 दिन   3 दिन   1 दिन एवं सातवीं पीढी से आगे सूतक नहीं माना है जैन दर्शन पुस्तक जन्म 3 दिन मरण 3 दिन श्रा‘ सं’
8 पीढी में    1 दिन-रात   1 दिन-रात   ;संकेत-श्रावकाचार संग्रहद्ध
9 पीढी में    6 घण्टा 6 घण्टा स्नान तक ;पूजन पाठ प्रदीपद्ध
10 पीढी में    स्नान तक    स्नान तक    स्नान करने तक

पुत्री एवं अन्य रिश्तेदार;निज घरद्ध 3 दिन
3 दिन घर से बाहर हो तो नहीं लगेगा,;गृहनिवास से बाहर जन्म मरण हो तो सूतक पातक नहीं लगेगाद्ध
अन्य,व्यक्ति,दासी,दास,पालतू जानवर ;निज घरद्ध 1 दिन 1 दिन घर से बाहर हो तो नहीं लगेगा,;गृहनिवास से बाहर जन्म मरण हो तो सूतक पातक नहीं लगेगाद्ध
ग्रहत्यागी,सन्यासी,संग्राम में 1 दिन 1 दिन घर का त्याग कर समाधि पूर्वक मरण हो तो 1 दिन का सूतक लगेगा
गोत्री अन्य स्थान पर ;विदेश में खबर आने के पीछे एक दिन खबर आने के पीछे एक दिन बंटवारा, वैमनस्यता होने पर भी सूतक पातक लगता है।
गर्भस्राव होने पर ; 3 माह तक जितने माह का हो उतने दिन का परिवारजनों को नहीं लगेगा
गर्भपात होने पर;4 से 6 माह तक जितने माह का हो उतने दिन का परिवारजनों को 1 दिन का लगेगा
मरा हुआ बालक जन्मे माता को 45 दिन
जीवित बालक जन्मे नाल छेदने पर मरण हो जाये माता को 45 दिन
आठ वर्ष तक के बालक का मरण होने पर 3 पीढी तक 10 दिन
अपघात/गर्भपात कराने पर 6 माह
रजस्वला स्त्री 5 दिन पश्चात शुद्धि
व्याभिचारिणी स्त्री/व्याभिचारी पुरूष जीवन पर्यंत जीवन पर्यंत
सप्त व्यसन में आसक्त स्त्री पुरुष जीवन पर्यंत जीवन पर्यंत
प्रसूति स्थान/मरण स्थान
10 दिन 3 दिन
नोट – सूतक पातक के काल का निर्धारण क्षेत्रिय परम्परा के अनुसार करें ।

संस्कृति हमारी विरासत

विरासत का शाब्दिक अर्थ होता है पूर्वजों के द्वारा अपने अग्रजों को प्रदान की गई धन सम्पत्ती आदि। इस धन सम्पत्ती आदि को सम्हालना सहेजना और आगे की पीढियों को अग्रेषित करना यह हमारा कर्तव्य है।
धन धान्य आदि की विरासत को तो हम आगे की पीढी को हस्तांतरित कर देते हैं लेकिन ‘‘संस्कृति की विरासत,, इसको हम अपेक्षित ही छोड देते हैं यह कोई बाह्य वस्तु नहीं हैं और न ही कोई वस्त्राभूषण है कि जब मन आया तब उठाकर उपयोग कर लिया जाए और इसलिए ही तो कहा जाता है कि -ः
;जिस धर्म समाज,नगर या देश की अपनी स्वयं की संस्कृकि या स्वयं का इतिहास नहीं होता उसका कोई अस्तित्व नहीं होता हैद्ध
इसे एक बार खोने के बाद द्वारा नहीं पाया जा सकता यह एक ऐसा आभूषण है जो सदियों पहले तीर्थंकरों से प्राप्त हुआ था तभी से यह व्यक्ति दर व्यक्ति पीढी दर पीढी आगे बढाया जाता रहा है प्रत्येक व्यक्ति,पीढी और समाजें इस कार्य के प्रति सजग रहीं लेकिन आधुनिकता की चकाचौंध में हम ही शिथिल पड गये हैं।
लेकिन हमे इस बात से वाकिफ हाना चाहिए कि इस संस्कृति की विरासत को आगे बढाना होता है लागों के दिलों में दिमाग में इस संस्कृति नाम की वस्तु का स्थान पक्का करना होता है जिस प्रकार भगवान महावीर के निवार्ण के 2545 वर्ष पूर्ण हो जाने के बाद भी श्रमण परम्परा निर्बाध रूप से चली आ रही है उसी प्रकार हमें भी श्रावक परम्परा सद्ग्रहस्थों की परम्परा को भी अक्षुण बनाये रखने का दायित्व सजगता के साथ निभाना चाहिए।
आज विचार करने योग्य बात यह है कि इस भौतिक चकाचौंध से परिपूर्ण युग में हम किस तरह से जैन संस्कृति को और श्रावकत्व को बचा कर रख सकते हैं ?
तो इसका सबसे सरल उपाय और युग युग से चला आया माध्यम है कि ‘‘हमारे नन्हे मुन्नों को,किशोरों को किशोरियों को विवाह बंधन में बंधे
नवदम्पत्यिं को हम दुनियां की सबसे सभ्य सुंदर और स्वस्थ इस जैन संस्कृति से अवगत करायें अपनी रीती रिवाजों धार्मिक परम्पराओं की सच्ची विरासत को उनके हाथों में सौंपें तभी हम इस उच्च संस्कृति को सुरक्षित और सवंर्द्धित कर सकते हैं।
लेकिन इसके लिए हमें स्वयं अपने आचरण मे सुधार लाना होगा,अपने जीवन को स्वस्थ संस्कारित और सुदृढ बनाना होगा श्रावकों के छैः आवश्यक कर्तव्यों
1- देव पूजा 2- गुरु उपासना 3-स्वाध्याय 4-संयम 5- तप 6-दान
इनको कटिवद्धता से स्वीकार करना होगा सामाजिक जीवन को स्वीकार करना होगा समाज की मर्यादाओं का ख्याल रखना होगा।
क्यांकि बच्चे तो गीली मिट्टी के समान होते हैं यह मातापिता को या बडों को जैसा करते हुए देखते हैं वैसे ही सीखते हैं और वैसा ही करते हैं इसलिए यह हर एक मातापिता का कर्तव्य है कि वो बनावटी दुनियां से बाहर निकल कर अपने आने वाले भविष्य को,बच्चों को संस्कारित बनायें नहीं तो वो दिन दूर नहीं जब हम भगवान आदिनाथ,भगवान महावीर और अपने पूर्वजों से प्राप्त रीती रिवाजों परम्पराओं/सभ्यताओं की धरोहर को पूर्णतया विलुप्त कर देंगे और इसके उत्तरदायी सिर्फ और सिर्फ हम होंगे।
इसलिए ‘‘जागो जैनों जागो,, जैन दर्शन के माध्यम से अपने जीवन जीने की शैली को सुदृढ करो।
प्रत्येक समाज की एक शैली होती है जिसे वह जीने की कला कहता है जैनो की संस्कृति ;‘‘जियो और जीने दो,,द्ध की है इस संस्कृति पर अडिग रहो इससे महान विचार अन्यत्र मिलने वाले नहीं हैं।
वैसे तो जब बच्चा मां के गर्भ में होता है तभी से बच्चे के मनःमस्तिष्क में संस्कारों का बीजारोपण होने लगता है लेकिन फिर भी जब बच्चा जन्म के पश्चात 40-45 दिन का होता है तो हम उसे मंदिरजी लेकर आते हैं और विधिवत् रूप से संस्कार प्रदान करवा के श्रावक बना देते हैं लेकिन क्या इतने मात्र से ही हमारा कर्तव्य पूरा हो जाता है क्या ? इसके अलावा भी तो
कुछ और कर्तव्य हाते हैं जिनको हमें सम्यक प्रकार से निर्वहन करना चाहिए।
जन्म के संस्कारों की तरह बाद में हमारा यह भी कर्तव्य है कि बच्चा जब आठ वर्ष का हो तो उसे भगवान का अभिषेक करवायें पूजा करायें जैन धर्म के बारे में उसे छोटी छोटी कहानियों के माध्यम से समझाएं उसे अच्छी मित्रता के बारे में भी बताऐं ताकि उसकी आस्था जिनेन्द्र भगवान के प्रति प्रगाढ हो और उसका मन अन्यत्र किन्ही अन्य देवी देवताओं की ओर उसका झुकाव न हो पाये और बच्चा भटक ना सकें।
जिस प्रकार हम स्कूली शिक्षा से परिचय कराते हैं उसी प्रकार हमारा कर्तव्य बनता है कि धार्मिक शिक्षा के माध्यम से अध्यात्मिक जीवन से बच्चों को जोडें।
आजकल जैन समाज के द्वारा बच्चों में धार्मिक चेतना जगाने के लिए पाठशाला,शिविर आदि का आयोजन होता रहता है तो को क्यों न हम दो कदम आगे बढा कर बच्चों के जीवन में धार्मिक चेतना जगायें।
जब हमारे बच्चे के जीवन में श्रद्धा,ज्ञान और चारित्र का विकास होगा तो परम्परायें और संस्कृति अपने आप ही सुरक्षित और सवंर्द्धित हागी।
इसलिए संस्कारों का महत्व समझते हुए अपने जीवन में और बच्चों के जीवन में सुधार लाऐं।
आपका शुभेक्क्षु
शास्त्री रूपेश अजित सौजना
9468623114

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